सुना है हम विश्व गुरु बन रहे हैं बिन शिक्षा के
भारत में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर हाल के वर्षों में चिंताजनक रुझान सामने आए हैं। 2020-21 से 2024-25 के बीच देशभर में 18,700 से अधिक सरकारी स्कूल या तो बंद कर दिए गए या फिर उन्हें अन्य स्कूलों में मिला दिया गया। यह आंकड़ा पिछले एक दशक में लगभग 8% की गिरावट को दर्शाता है, जो शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा संकेत है।
सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में देश में लगभग 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जो घटकर 2023-24 में करीब 10.17 लाख रह गए हैं। इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण कम नामांकन (enrollment), ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों का एकीकरण (merger) और संसाधनों का पुनर्गठन बताया जा रहा है। कई ऐसे स्कूल भी हैं जहां छात्रों की संख्या शून्य या बहुत कम है, जिसके कारण उन्हें पास के बड़े स्कूलों में मिला दिया गया।
राज्यों में स्थिति
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में सरकारी स्कूलों की संख्या में अधिक गिरावट दर्ज की गई है। वहीं राजस्थान में स्थिति और भी गंभीर नजर आई, जहां एक दर्दनाक हादसे के बाद राजस्थान हाई कोर्ट ने 86,000 से अधिक जर्जर और असुरक्षित कक्षाओं को बंद करने का आदेश दिया। इससे स्कूलों की आधारभूत संरचना (infrastructure) पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
ढांचा और शिक्षकों की कमी
कई क्षेत्रों में अभी भी ऐसे स्कूल मौजूद हैं जहां 10 से कम छात्र पढ़ते हैं, जो शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों के सही उपयोग पर सवाल उठाते हैं। दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में गणित और विज्ञान विषयों के शिक्षकों की कमी को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि स्कूलों की कार्यक्षमता बेहतर हो सके।

निजी स्कूलों की बढ़ती पकड़
जहां एक तरफ सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट आई है, वहीं निजी स्कूलों में नामांकन पिछले दशक में लगभग 14% बढ़ा है। यह दर्शाता है कि अभिभावक बेहतर शिक्षा और सुविधाओं के लिए निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं।

