नई दिल्ली। देश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर विवादों में है। इस बार मुद्दा है कथित “ओपन सीट सेल सिस्टम”, जहां आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ कॉलेजों और संस्थानों में सीटें खुलेआम पैसों के आधार पर दी जा रही हैं। इस मॉडल को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
आरोपों के अनुसार, कुछ संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया को इस तरह बना दिया गया है कि जो पहले आता है और ज्यादा पैसे देता है, उसे आसानी से सीट मिल जाती है। इसे आम भाषा में “पहले आओ, पैसे दो और सीट लो” मॉडल कहा जा रहा है। इस व्यवस्था में मेरिट, मेहनत और योग्यता की भूमिका कम होती जा रही है।
छात्रों का कहना है कि वे लंबे समय तक प्रवेश प्रक्रिया का इंतजार करते हैं, परीक्षाएं देते हैं, मेरिट लिस्ट का इंतजार करते हैं, लेकिन अंत में सीट उन लोगों को मिल जाती है जो अधिक भुगतान कर सकते हैं। इससे योग्य छात्रों में निराशा और हताशा बढ़ रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों ने इस मॉडल की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि अगर इस तरह की व्यवस्था को खुली छूट दी गई, तो यह शिक्षा प्रणाली की नींव को कमजोर कर देगा। शिक्षा को एक व्यवसाय में बदलने का खतरा बढ़ जाएगा, जहां ज्ञान नहीं बल्कि पैसा ही सबसे बड़ा मापदंड बन जाएगा।
कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि पारदर्शिता के नाम पर “ओपन सीट सेल” को वैध ठहराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या पारदर्शिता का मतलब यह है कि पैसे के बदले सीट बेचना सही हो जाता है? विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यह मॉडल सामाजिक असमानता को और बढ़ाएगा।
इस मुद्दे पर यह मांग भी उठ रही है कि यदि कोई संस्थान सीटों की बिक्री में दोषी पाया जाता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उसकी मान्यता रद्द की जाए, भारी जुर्माना लगाया जाए और भविष्य में उसके प्रवेश अधिकारों पर रोक लगाई जाए।
सरकार और नियामक संस्थाओं से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे इस पूरे मामले की गहन जांच करें और एक पारदर्शी, निष्पक्ष और मेरिट-आधारित प्रवेश प्रणाली सुनिश्चित करें। डिजिटल काउंसलिंग और केंद्रीकृत एडमिशन प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत बताई जा रही है।

