चुनाव का समय आते ही पूरे देश का माहौल बदल जाता है। हर गली, हर मोहल्ले और हर शहर में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। नेता जनता के बीच पहुंचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादों की झड़ी लगाते हैं और हर संभव तरीके से लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते हैं। इस दौरान अक्सर ऐसा लगता है कि जो नेता कल तक दूर थे, आज वही जनता के सामने झुके हुए दिखाई देते हैं।
यहीं से एक कड़वी लेकिन सच्ची बात सामने आती है—वोट मांगने वाला नेता कुछ समय के लिए ‘भिखारी’ जैसा व्यवहार करता है, क्योंकि उसे आपकी जरूरत होती है। लेकिन अगर मतदाता बिना सोचे-समझे वोट देता है, तो वही मतदाता आने वाले पांच साल तक ‘भिखारी’ जैसी स्थिति में आ जाता है, जहां उसे अपने ही अधिकारों के लिए बार-बार गुहार लगानी पड़ती है।
यह बात सुनने में भले ही कठोर लगे, लेकिन लोकतंत्र की हकीकत यही है। चुनाव के समय जो नेता आपके दरवाजे पर आकर वादे करते हैं, वही जीतने के बाद अक्सर जनता से दूर हो जाते हैं। तब आम आदमी को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, अधिकारियों के सामने हाथ जोड़ने पड़ते हैं और कई बार अपनी ही जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
आज के दौर में चुनाव सिर्फ मुद्दों पर नहीं, बल्कि भावनाओं, जाति, धर्म और प्रचार के दम पर भी लड़े जाते हैं। सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली जानकारी और बड़े-बड़े वादे कई बार मतदाताओं को भ्रमित कर देते हैं। ऐसे में लोग असली मुद्दों से भटक जाते हैं और गलत उम्मीदवार को चुन लेते हैं। यही वह गलती होती है, जिसकी कीमत पूरे पांच साल तक चुकानी पड़ती है।
मतदाता को यह समझना होगा कि उसका एक वोट सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उसकी आवाज है, उसकी ताकत है। अगर इस ताकत का सही इस्तेमाल नहीं किया गया, तो परिणाम भी उसी के अनुसार मिलेंगे। एक गलत फैसला पूरे क्षेत्र के विकास को रोक सकता है, रोजगार के अवसरों को कम कर सकता है और आम जनता की समस्याओं को बढ़ा सकता है।
हमें यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र में जिम्मेदारी सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि मतदाताओं की भी होती है। अगर हम अपने अधिकार का सही इस्तेमाल नहीं करेंगे, तो हमें शिकायत करने का भी अधिकार कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए जरूरी है कि हम उम्मीदवार के पिछले काम, उसकी नीतियों और उसके इरादों को समझें और उसी के आधार पर वोट दें।
आज जरूरत है जागरूक मतदाता बनने की। हमें किसी के प्रभाव में आकर नहीं, बल्कि अपने विवेक से फैसला लेना चाहिए। चुनाव के समय मिलने वाले लालच, वादे या भावनात्मक अपील से ऊपर उठकर हमें देश और समाज के भविष्य के बारे में सोचना होगा।
अंत में यही कहा जा सकता है कि वोट मांगने वाला कुछ समय के लिए ‘भिखारी’ बनता है, लेकिन अगर हम समझदारी से वोट नहीं देते, तो हम खुद पांच साल तक ‘भिखारी’ जैसी स्थिति में आ सकते हैं। इसलिए अगली बार जब आप वोट देने जाएं, तो यह जरूर सोचें कि आपका एक फैसला आपके आने वाले पांच साल को किस दिशा में ले जाएगा।

