भारत में रविवार की छुट्टी का इतिहास केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ी गई लंबी लड़ाई का परिणाम है। आज से करीब 130 साल पहले, जब देश में ब्रिटिश शासन था, तब मिल मजदूरों की स्थिति बेहद खराब थी। उन्हें हफ्ते के सातों दिन बिना किसी अवकाश के लगातार काम करना पड़ता था।
उसी समय मजदूरों की आवाज बनकर सामने आए नारायण मेघाजी लोखंडे, जिन्हें भारत का पहला श्रमिक नेता भी कहा जाता है। उन्होंने मजदूरों के लिए बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और साप्ताहिक अवकाश की मांग को लेकर एक बड़ा आंदोलन शुरू किया।
नारायण मेघाजी लोखंडे के संघर्ष ने भारतीय श्रमिक आंदोलन में एक नया अध्याय जोड़ा।
लोकहांडे ने लगभग 7 साल तक लगातार संघर्ष किया। उनकी मुख्य मांग थी कि मजदूरों को सप्ताह में कम से कम एक दिन का आराम मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रविवार का दिन मजदूरों के लिए इसलिए उपयुक्त है क्योंकि यह दिन पहले से ही कई लोगों के लिए धार्मिक और सामाजिक महत्व रखता है।
लंबे संघर्ष और दबाव के बाद, आखिरकार 10 जून 1890 को ब्रिटिश सरकार ने मजदूरों की मांग मान ली और रविवार को साप्ताहिक अवकाश घोषित कर दिया। यह फैसला खासतौर पर मिल मजदूरों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया।
इस निर्णय के बाद धीरे-धीरे रविवार की छुट्टी का प्रावधान अन्य क्षेत्रों में भी लागू होने लगा और यह पूरे देश में एक सामान्य नियम बन गया। यह बदलाव भारतीय श्रमिक आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।
इतिहासकार मानते हैं कि यह कदम केवल छुट्टी देने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने भारत में श्रमिक अधिकारों की दिशा में एक नई शुरुआत की। इससे मजदूरों को अपने परिवार के साथ समय बिताने, आराम करने और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का अवसर मिला।
आज के समय में जब हम रविवार की छुट्टी का आनंद लेते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि यह सुविधा हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों का संघर्ष और आंदोलन छिपा है।
इस तरह, रविवार की छुट्टी सिर्फ एक दिन का अवकाश नहीं, बल्कि मजदूरों के अधिकारों और उनके संघर्ष की एक जीवंत मिसाल है, जिसने भारत के सामाजिक और श्रमिक इतिहास को नई दिशा दी।

